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एमयूआई ने बहलिल को कुर्बानी के कानून को लेकर सावधान रहने की याद दिलाई

एमयूआई ने बहलिल को कुर्बानी के कानून को लेकर सावधान रहने की याद दिलाई

एमयूआई केंद्र के उप महासचिव, डॉ. अमीनुद्दीन याकूब, सार्वजनिक अधिकारियों को धार्मिक कानून से जुड़े विचार व्यक्त करने में सावधानी बरतने की याद दिलाते हैं। यह बयान डीपीपी गोलकर पार्टी के अध्यक्ष और ऊर्जा खनिज संसाधन मंत्री, बहलिल लहाडालिया, की उस राय के जवाब में आया है जिसमें उन्होंने कहा कि कुर्बानी हर मुसलमान पर अनिवार्य है। अमीनुद्दीन ने समझाया कि कुर्बानी के कानून को लेकर विद्वानों के बीच दो मुख्य मत हैं। शाफ़ई, मालिकी और हंबली मज़हबों के अधिकतर विद्वान इसे सुन्नत मुअक्कदा मानते हैं, जबकि हनफ़ी मज़हब इसे सक्षम लोगों पर अनिवार्य ठहराता है। यह मतभेद स्वाभाविक है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए। अमीनुद्दीन के अनुसार, बहलिल का हनफ़ी मज़हब की राय अपनाना जायज़ है, लेकिन उन्हें इंडोनेशियाई मुसलमानों के बहुमत के शाफ़ई मज़हब के दृष्टिकोण का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि किसी एक राय को सबसे सही मानकर दूसरों पर नहीं थोपा जा सकता। एमयूआई आग्रह करता है कि धार्मिक कानून के मामलों को एमयूआई या विशेषज्ञों जैसे धार्मिक प्राधिकारियों पर छोड़ दिया जाए। इससे पहले, बहलिल ने हरियन कोम्पास में अपनी राय में कुर्बानी को ज़कात फ़ित्र की तरह अनिवार्य बताया था, जो 26 मई 2026 को प्रकाशित हुई थी। https://www.gelora.co/2026/05/mui-ingatkan-bahlil-berhati-hati.html

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टिप्पणियाँ

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भाई
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मेरे गाँव में क़ुर्बानी सुन्नत-ए-मुअक्कदा है, पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली रही है। राय अलग होने से कोई दिक़्क़त नहीं, बस ज़बरदस्ती हो।

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भाई
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पाक बहलिल का इरादा शायद अच्छा हो, लेकिन इस तरह सामान्यीकरण मत कीजिए। हनफ़ी मज़हब अपनाना ठीक है, लेकिन आम लोगों को भ्रमित मत कीजिए।

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भाई
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बहलिल एक राजनीतिज्ञ हैं, तो धर्म के मामले में थोड़ी चूक हो जाना स्वाभाविक है। लेकिन हाँ, फिर से सीखना चाहिए, बिना सोचे-समझे बोलना नहीं चाहिए।

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