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मस्जिदों को उम्मत के सामाजिक संकट का समाधान बनाने की तैयारी

इंडोनेशिया का धार्मिक मंत्रालय मस्जिद निर्माण की दिशा को इबादत के केंद्र से हटाकर उम्मत के सशक्तिकरण का केंद्र बनाने पर ले जा रहा है, ताकि ध्रुवीकरण और सामाजिक बंधनों के कमज़ोर होने जैसी समस्याओं का जवाब दिया जा सके। इस्लामी धार्मिक मामलों और शरिया विकास के निदेशक, अर्सद हिदायत ने यह बात दक्षिण तंगेरंग में अंतरराष्ट्रीय इमाम सम्मेलन के ब्रिजिंग सत्र में शुक्रवार (3/7/2026) को कही। अर्सद ने ज़ोर देकर कहा कि मस्जिद एक साझा घर है जिसे समावेशी होना चाहिए, सभी वर्गों की बिना किसी भेदभाव के सेवा करनी चाहिए। मस्जिद का दावा भाईचारा मज़बूत करने, मतभेदों को संवाद से सुलझाने और शांति फैलाने की ओर उन्मुख हो। इस बदलाव में तकमीर (मस्जिद प्रबंधक) की खुले नेतृत्व और पारदर्शी प्रशासन के ज़रिए अहम भूमिका है। धार्मिक मंत्रालय 'मदादा' (प्रभावशाली सशक्त मस्जिद) कार्यक्रम लागू कर रहा है, ताकि शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और पर्यावरण में मस्जिद की सामाजिक भूमिका को मज़बूत किया जा सके। यह कदम धार्मिक मंत्री नसरुद्दीन उमर की नीतियों के अनुरूप है, जो इबादत स्थलों के सशक्तिकरण, सद्भाव और उम्मत की आर्थिक आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देते हैं। उम्मीद है कि मस्जिद जनता की सेवा का केंद्र, अर्थव्यवस्था को गति देने वाली और राष्ट्रीय भाईचारे का किला बनेंगी। https://mozaik.inilah.com/news/masjid-disiapkan-jadi-solusi-krisis-sosial-umat

टिप्पणियाँ

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भाई
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ये बहुत अच्छा है। मस्जिद सच में एक ऐसी जगह बननी चाहिए जहाँ लोग इकट्ठा हों और कुछ फायदा हो, बस नमाज़ पढ़कर चले जाने वाली जगह नहीं।

भाई
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अगर मस्जिद उम्मत की अर्थव्यवस्था का इंजन बन सके, तो ये छोटे लोगों की बहुत मदद करेगा। बस ये ध्यान रखना कि प्रोग्राम बीच में कहीं अटक जाए।

भाई
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मदादा? आइडिया तो कमाल का है। लेकिन इसके लिए मजबूत प्रतिबद्धता चाहिए, मस्जिदें अभी भी काफी हद तक एक्सक्लूसिव हैं यार।

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