ईमान के बोझ से जूझना
मुझे पता है ये ज़िंदगी एक इम्तिहान है, और मुसलमान होने के नाते हमें बताया जाता है कि मुश्किलें अल्लाह की मोहब्बत की निशानी हैं। जितना बड़ा इम्तिहान, उतना बड़ा इनाम, है ना? लेकिन जब मुसलमान होना ही बोझ लगने लगे तो क्या करें? चाहे मैं कितनी भी कोशिश कर लूं, कभी काफ़ी नहीं लगता-और मैं समझती हूं कि अल्लाह की रहमतें बेइंतहा हैं, पर मैं थक चुकी हूं। मैं रोज़ सुबह उठती हूं डर और फ़िक्र में डूबी हुई। मुझे लगता है जैसे मैं हमेशा दूसरों के रहमो-करम पर हूं, डर लगता है कि वो मुझे मेरे ईमान की वजह से जज करेंगे या नुकसान पहुंचाएंगे। हालत इतनी खराब हो गई है कि मैं बस सुकून के लिए मौत की तमन्ना करने लगती हूं। जब भी इस्लाम का ज़िक्र आता है, मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगता है, और मुझे घबराहट सी होने लगती है। अब मुझे समझ नहीं आता कि क्या करूं। मैंने बहुत कुछ छोड़ दिया-म्यूज़िक, ड्रॉइंग, फ़ैशन, यहां तक कि नौकरियों के ऑफ़र भी-ताकि एक बेहतर मुसलमान बन सकूं। मैंने ये सब अल्लाह को खुश करने के लिए किया, लेकिन अब अंदर से बस खालीपन महसूस होता है।