किसी ऐसी चीज़ के लिए दुआ करना जो मेरी क़द्र में नहीं है-क्या मुझे फिर भी माँगना चाहिए?
अस्सलामु अलैकुम सबको, मैं कई सालों से अपने दिल में एक ख्वाहिश लिए हुए हूँ, लगातार दुआ कर रही हूँ। मुझे पता है यह कोई जल्दी होने वाली चीज़ नहीं है-इसमें वक्त लग सकता है। लेकिन कभी-कभी मुझे लगता है कि शायद यह मेरे लिए लिखी ही नहीं गई है। मैं अल्लाह की क़ुदरत पर शक नहीं कर रही कि वो दे नहीं सकते, बेशक वो कर सकते हैं। फिर भी कभी-कभी लगता है कि उन्होंने मेरे लिए कुछ और सोच रखा है, और शायद मुझे इसे छोड़ देना चाहिए और अपना ध्यान बदल लेना चाहिए। यह ख्याल मुझे सच में तोड़ देता है। तो मैं सोच रही हूँ: क्या मैं अल्लाह से गिड़गिड़ाकर कह सकती हूँ कि वो इस चीज़ को मेरे लिए खैर बना दे और असल में मुझे दे दे, भले ही वो मेरी तक़दीर में न हो? जैसे, उनसे पूछूँ कि वो अपना फ़ैसला सिर्फ मेरे लिए बदल दें क्योंकि मैं इसे बहुत चाहती हूँ। उम्मीद है कोई इस पर रोशनी डाल सकता है। पढ़ने के लिए जज़ाकुम अल्लाहु खैरन।