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ज़कात-वक्फ का समावेश गरीबी से निपटने की नई कुंजी

ज़कात, इन्फाक, सदकाह और वक्फ का समावेश गरीबी उन्मूलन और स्थायी कल्याण को मज़बूत करने का एक सामरिक कदम माना जा रहा है। बाज़नास आरआई के उपाध्यक्ष ज़ैनुत तौहीद सअदी ने ज़ोर देकर कहा कि इस्लामी परोपकार की क्षमता तब और अधिक बेहतर होगी जब इसे एक एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र में प्रबंधित किया जाए। हर साधन का अलग काम है और वे एक-दूसरे के पूरक हैं। ज़कात उत्पादक व्यवसाय की पूंजी बन सकती है, वक्फ संपत्ति और बुनियादी ढांचे की आपूर्ति कर सकता है, और इन्फाक प्रशिक्षण व्यवसाय सहायता में मदद करता है। ये साधन कमज़ोर समुदायों के लिए सामाजिक सुरक्षा जाल का काम भी करते हैं। ज़ैनुत ने केवल दान से आगे बढ़कर स्थायी सामाजिक बदलाव की दिशा में सोच बदलने पर ज़ोर दिया। मदद सिर्फ अल्पकालिक ज़रूरतें पूरी करने के बजाय आर्थिक सुधार, समावेश और सामुदायिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए। इस्लामी परोपकार के सभी स्तंभों के तालमेल से उम्मीद है कि एक स्थायी, न्यायसंगत और समावेशी विकास होगा, जो गरीबी और सामाजिक असमानता से निपटने में एक नई ताकत बनेगा। https://mozaik.inilah.com/news/integrasi-zakat-wakaf-jadi-kunci-baru-atasi-kemiskinan-berkelanjutan

टिप्पणियाँ

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भाई
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बिल्कुल सहमत! अब तक तो बस चावल बांट दिया, काम खत्म। असल में लोगों को आत्मनिर्भर बनाना चाहिए। उम्मीद है जल्दी लागू हो।

भाई
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ये तो स्मार्ट सॉल्यूशन है। इस्लाम के सारे इंस्ट्रूमेंट्स को सिनर्जाइज़ करो, सिर्फ़ चैरिटी नहीं बल्कि एम्पावरमेंट। मुझे पूरा यकीन है कि अगर नीयत सही हो तो काम होगा।

भाई
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उत्पादक वक़्फ़ बहुत ज़रूरी है। सोचो, वक़्फ़ की ज़मीन पर दुकानें बना दी जाएँ, ज़कात से उसका पूँजी लगा दें। लेकिन इसके लिए काबिल अमिल लोग चाहिए।

भाई
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आखिरकार कोई तो दूर की सोच रहा है। ज़कात को बिज़नेस के लिए पूंजी बनाना, वक्फ़ को इंफ्रास्ट्रक्चर में लगाना, बढ़िया सोच है। लेकिन इसको मैनेज करना थोड़ा पारदर्शी होना चाहिए, नहीं तो गड़बड़ होने का डर रहता है।

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