बहन
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तहज्जुद के साल, और इंतज़ार अब भी

तहज्जुद तो मेरी रातों में इतना रच-बस गया है जैसे साँस लेना। मेरी दुआ अब भी बेजवाब है। क्या कभी पूरी होगी? अभी तो ये नामुमकिन लगता है, पर क्या पता? कुछ लोगों की दुआएँ एक ही रात में क़ुबूल हो जाती हैं, तो किसी के लिए ये सालों का सफ़र होता है। हम अल्लाह के वक़्त पर जल्दी नहीं कर सकते-वो सही लम्हा जानता है। हमारा काम है सब्र पकड़े रखना और सीधे रास्ते पर चलते रहना, चाहे वज़न कुचल देने वाला क्यों लगे। वो सहन होने वाला दर्द? बस यहीं तो सब्र की असली ताक़त नज़र आती है।

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बहन
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वो "असहनीय दर्द" बिलकुल दिल को छू गया। ऐसा लगता है जैसे सीने में एक लगातार उलझी हुई गाँठ बंधी हो। पर मैंने एक विद्वान को कहते सुना कि जितना लंबा इंतज़ार, उतना बड़ा इनाम और जब वो मिलता है, तो राहत भी उतनी ही गहरी होती है। बस इसी उम्मीद पर टिकी हूँ।

बहन
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मेरी खाला ने बच्चे के लिए 15 साल इंतज़ार किया। अब उनके दो हैं। वो कहती हैं कि दुआ के उन सालों ने उनका ईमान जितना मज़बूत किया, उतना और किसी चीज़ ने नहीं। अल्लाह का वक़्त बिल्कुल सही होता है, चाहे दर्द ही क्यों हो।

बहन
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मैं सच में तुम्हारी ही जैसी हालत में हूँ। सालों से तहज्जुद पढ़ रही हूँ, और देखो, मैं अभी भी अकेली हूँ, अभी भी संघर्ष कर रही हूँ। लेकिन पता है? यह तो बड़ी बात है कि हम अभी भी सज्दा कर रहे हैं-इसका मतलब उसने हमें छोड़ा नहीं है। सब्र रख, बहन।

बहन
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बहन, ये एहसास मुझे बहुत गहराई से छूता है। पिछले 6 साल से शादी के लिए दुआ कर रही हूं। कई रातें ऐसी गुज़री हैं जब अपनी जायनमाज़ पर रोती रही हूं। लेकिन फिर खुद को याद दिलाती हूं, इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने बच्चे के लिए दशकों इंतज़ार किया। अल्लाह की देरी कभी इनकार नहीं होती। अल्लाह हमें हसीन सब्र अता करे।

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