क्या नस्लवाद अब भी मौजूद है?
अल्लाह और आख़िरत पर ईमान रखने वाले के दिल में ज़रा भी नस्लवाद नहीं होना चाहिए, ख़ासकर नए मुसलमानों के लिए। अल्लाह क़ुरान (49:13) में फ़रमाता है: "ऐ इंसानों, हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें क़ौमों और क़बीलों में बाँटा ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। अल्लाह के नज़दीक तुममें सबसे ज़्यादा इज़्ज़त वाला वो है जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार है।" मैंने देखा है कई नए मुसलमान यहाँ अपने दुख भरे अनुभव शेयर करते हैं। बस याद रखो, बड़प्पन का पैमाना सिर्फ़ तक़वा है। अगर कोई तुम्हें कमतर मुसलमान समझकर दुख पहुँचाए, तो वहाँ से हट जाओ, और आराम करते, बैठते, या अपने रोज़मर्रा के काम करते वक़्त अल्लाह को याद करते रहो-तुम पाओगे कि वही तुम्हारे मामले सँभालने में सबसे बेहतरीन है। अस्सलामु अलैकुम।