ईमान सिर्फ़ दावा नहीं: मौलिद नबी पर कियाई चोलिल का संदेश
पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व. के मौलिद का आयोजन ईमान की गुणवत्ता मापने का ज़रिया बनना चाहिए, सिर्फ़ समारोह नहीं। एमयूआई के उपाध्यक्ष के.एच. एम. चोलिल नफ़ीस ने ज़ोर देकर कहा कि ईमान सिर्फ़ ज़ुबान से इक़रार करने से पूरा नहीं होता; सच्चा मोमिन वही है जो रसूलुल्लाह स.अ.व. की पैरवी करे, अपनी बात और अमल से दूसरों को तकलीफ़ न पहुँचाए।
कियाई चोलिल ने समझाया कि नबी से मुहब्बत उनके हुक्मों पर अमल और मनाही से बचने में ज़ाहिर होनी चाहिए। मौलिद मुहासबा का भी मौक़ा है कि इंसान ख़ुद को कितना पैग़म्बर मुहम्मद स.अ.व. की उम्मत कहलाने के लायक़ समझता है।
उन्होंने मुसलमानों को रसूलुल्लाह की तीन ख़ास अदाएं अपनाने की तरग़ीब दी: ख़ुशरूई (बसतुल वज्ही), दूसरों को तकलीफ़ न देना (कफ़्फ़ुल अज़ा), और क़ुरबानी का जज़्बा (बज़लुन नदा)। ये पैग़ाम उस मुआशरे में बहुत मुनासिब है जहाँ अक्सर झगड़े होते हैं, इत्तिहाद पर ज़ोर देते हुए जैसा कि मीसाक़-ए-मदीना और इत्तिहाद-ए-इंडोनेशिया की रूह है।
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