क्या मैं ये सोचने में ग़लत हूँ कि ये ज़िंदगी बस अगली ज़िंदगी का ज़रिया है?
अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह, मुझे थोड़ी सलाह चाहिए उस बातचीत के बारे में जो आज दीन पर हुई। मैंने कुछ ऐसा कहा कि ये दुनिया असल में कोई मायने नहीं रखती और असली ज़िंदगी तो आख़िरत है-ये मैंने हमेशा क़ुरआन की आयतों और हदीसों से ही समझा है। जिस इंसान से मैं बात कर रहा था, वो नाराज़ हो गया और मेरी सोच को "इंतहापसंद" बता दिया। उनका कहना था कि हमें संतुलन चाहिए और दुनिया का भी अपना महत्व है। लेकिन मुझे लगता है दुनिया तो बस एक ज़रिया है, समझे? जैसे ये एक अस्थायी खेत है या इम्तिहान की जगह (दार-अल-बला) जहाँ हम नेक काम करते हैं, अपनी ज़िम्मेदारियाँ निभाते हैं, और अपनी आख़िरत के लिए मेहनत करते हैं। आख़िरत के बिना, यहाँ की खुशियाँ टिकती नहीं हैं। क्या मैं ग़लत दिशा में हूँ इस सोच के साथ? क्या दुनिया को सिर्फ़ आख़िरत का रास्ता मानना इंतहापसंदी है, या इस्लाम में ये आम बात है? आप लोगों की राय जानना पसंद करूँगा, और किसी आलिम की राय, क़ुरआन की आयतें या हदीसें जो सही संतुलन समझने में मदद करें। जज़ाकअल्लाह खैर!