रिश्ते निभाने के बारे में 9 क़ुरआनी आयतें, उनके मतलब और व्याख्या
रिश्तेदारी निभाना इस्लाम में एक अहम अमल है जिसका सीधा हुक्म क़ुरआन में दिया गया है। बहुत सी आयतें रिश्तेदारी के रिश्ते क़ायम रखने, रिश्तेदारों के साथ अच्छा बरताव करने और दुश्मनी से बचने की पाबंदी को पुख़्ता करती हैं। इनमें से, सूरह अन-निसा की आयत 1 तक़वा अख़्तियार करने और रिश्तेदारी के ताल्लुक़ात बनाए रखने का हुक्म देती है। सूरह अन-निसा की आयत 36 माँ-बाप के बाद रिश्तेदारों से अच्छा सुलूक करने पर ज़ोर देती है। सूरह अन-नहल की आयत 90 इंसाफ़, नेकी और रिश्तेदारों की मदद करने की तालीम देती है। सूरह अल-हुजुरात की आयत 10 मोमिनों के बीच भाईचारे और सुलह की दावत देती है। सूरह अर-राद की आयत 25 रिश्ते तोड़ने वालों को अज़ाब की धमकी देती है। सूरह मुहम्मद की आयत 22-23 रिश्तेदारी के ताल्लुक़ात ख़त्म करने वालों पर लानत भेजती है। सूरह अश-शूरा की आयत 23 रिश्तेदारी की मोहब्बत को नेक अमल बताती है। सूरह अल-अनफ़ाल की आयत 1 आपसी ताल्लुक़ात सुधारने की तरग़ीब देती है। सूरह अल-इसरा की आयत 26 रिश्तेदारों का हक़ अदा करने का हुक्म देती है। ये आयतें इस बात पर ज़ोर देती हैं कि रिश्तेदारी निभाना ईमान की निशानी और एक मुसलमान के बेहतरीन अख़लाक़ का हिस्सा है।
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