मुहर्रम क्यों बनता है इस्लामी नया साल? इसका इतिहास और अर्थ
मुसलमानों के पास अपना कैलेंडर है जिसमें इस्लामी नया साल 1 मुहर्रम को पड़ता है। इसकी स्थापना खलीफ़ा उमर बिन खत्ताब ने 17 हिजरी (638 ई.) में हिजरी कैलेंडर के निर्माण से जुड़ी है। हिजरी नाम पैग़ंबर मुहम्मद (स.) के मक्का से मदीना हिजरत करने की घटना से लिया गया है।
कैलेंडर बनाने का विचार इसलिए आया क्योंकि अलग-अलग इलाकों में भेजे जाने वाले ख़त और दस्तावेज़ों पर तारीख़ और साल की साफ़ जानकारी नहीं होती थी। उमर ने सहाबा से मशवरा किया कि समय-गणना की शुरुआत कहाँ से करें। इस बात पर सहमति हुई कि पैग़ंबर की हिजरत को इस्लामी साल की शुरुआत बनाया जाए, क्योंकि हिजरत सभ्यता का बड़ा पड़ाव थी और हक़-बातिल के बीच फ़र्क़ करने वाली थी।
हालाँकि हिजरत रबीउल अव्वल में हुई, लेकिन हिजरत का फ़ैसला और तैयारी मुहर्रम में ही शुरू हो गई थी। उसमान बिन अफ़्फ़ान ने सुझाव दिया कि मुहर्रम को साल का आग़ाज़ बनाया जाए क्योंकि यह हराम महीनों में है, हज के बाद का वक़्त है, और अरबी रिवायतों में पहला महीना है।
मुहर्रम की बड़ी फज़ीलत है, यह बुज़ुर्गी वाला महीना (सूरह तौबा आयत 36), अल्लाह का महीना है, और इसमें अहम सुन्नत रोज़े हैं जैसे आशूरा का रोज़ा जो पिछले साल के गुनाह मिटा देता है।
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