हम जिन कठिन दिनों से गुज़र रहे हैं
सच कहूँ, हर बार जब मैं अपना फ़ोन उठाता हूँ, इस्लाम के ख़िलाफ़ कुछ न कुछ या अश्लील सामग्री सामने आ जाती है। टीवी चालू करता हूँ तो बस दिल दहला देने वाली ख़बरें होती हैं-दर्द में हमारे मुस्लिम भाई-बहन, रोते बच्चे, और मैं अंदर से बोझिल महसूस किए बिना नहीं रह पाता। हमारी उम्माह के साथ क्या हो रहा है? हम रास्ता कहाँ भटक गए?