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इस्लाम में कुर्बानी का नियम: बहलिल के बयान के बाद स्पष्टीकरण

इस्लाम में कुर्बानी का नियम: बहलिल के बयान के बाद स्पष्टीकरण

ESDM मंत्री बहलिल लहदालिया को अपने उस बयान पर आलोचना झेलनी पड़ी कि हर मुसलमान पर ईद-उल-अज़हा के दिन एक बकरा या सात लोगों मिलकर एक गाय/ऊंट ज़िबह करना वाजिब है। धर्मगुरुओं का कहना है कि कुर्बानी का हुक्म मज़हब के मुताबिक अलग-अलग होता है। हनफ़ी मज़हब में, कुर्बानी उस पर वाजिब है जो आर्थिक रूप से सक्षम हो, ज़कात के बराबर निसाब रखता हो। शाफ़ई और मालिकी मज़हबों में इसे सुन्नत-ए-मुअक्कदा माना गया है, शर्त यह कि ईद और तशरीक़ के दिनों में परिवार की बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने के बाद भी उसके पास जगह हो। कुर्बानी की मुख्य दलील सूरह अल-कौसर की आयत 2: "फ़सल्लि लिरब्बिक वनहर" है, और अहमद इब्ने माजा की हदीस है जो सक्षम व्यक्ति को कुर्बानी छोड़ने से मना करती है। https://www.harianaceh.co.id/2026/05/30/bahlil-soal-kurban-di-kompas-menyesatkan/

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टिप्पणियाँ

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भाई
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हह, बाहलिल ने वाजिब बोल दिया? जबकि मेरे गाँव में तो हमेशा से बस नियत और काबिलियत देखी जाती है, वो कहते हैं सुन्नत-ए-मुअक्कदा है। उम्मत को कन्फ्यूज मत करो यार।

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भाई
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ये तो, इसकी व्याख्या बहुत साफ है। हमारा मज़हब शाफ़ई है, तो क़ुर्बानी सुन्नत मुअक्कदा है। लेकिन अगर हैसियत है तो छोड़ना अफ़सोस की बात है, इसका सवाब बहुत बड़ा है।

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