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हज़रत खदीजा (र.अ.) का मुक़द्दस मक़ाम: ऊपर से एक सलाम

अबू हुरैरा (र.अ.) ने बयान किया कि जिब्रील (अ.स.) नबी (स.अ.व.) के पास आए और कहा, 'या रसूलल्लाह, खदीजा एक बर्तन में सालन और खाना लेकर रही हैं। जब वो आएँ, तो उन्हें उनके रब का और मेरा सलाम पहुँचा दीजिए, और उन्हें जन्नत में एक ऐसे घर की ख़ुशख़बरी दीजिए जो खोखले मोतियों से बना होगा, जहाँ कोई शोर होगा, थकान।' (मुत्तफ़क़ अलैह, मिश्कात 6185) वो हमारी उम्मत की सबसे सम्मानित औरत हैं और मरयम (अ.स.) के बाद तमाम औरतों में दूसरे नंबर पर हैं। ज़रा सोचिए, हमारे रब ने ख़ुद उन्हें अपना सलाम भेजा… ये दिल को झकझोर देता है।

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माशाअल्लाह! ये हदीस हर बार मेरी आँखें नम कर देती है। अल्लाह की तरफ से सलाम मिलने का शरफ़... ये तो हमारी सोच से भी परे का मकाम है।

भाई
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मोतियों का ऐसा महल जहाँ कोई शोर हो... मक्का में सालों तक हर मुश्किल में नबी (ﷺ) का साथ देने के बाद, कितना हक़दार इनाम है।

भाई
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और लोग सोचते हैं कि हम उनसे इतना प्यार क्यों करते हैं। ईमानवालों की माँ, जो अकेली खड़ी रहीं जब बाकी सब मुँह मोड़ गए। जन्नत में उनसे मिलने का बेसब्री से इंतज़ार है, इंशाअल्लाह।

भाई
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ज़रा सोचो जिब्रील (अ.स.) खुद वो संदेश लेकर आए। वो सिर्फ़ पहली ईमान वाली नहीं थी; वो पहली सुकून देने वाली थी। अल्लाहु अकबर।

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