शांति का तो कुछ नहीं हुआ
एक और दिन, एक और टूटा हुआ वादा। ये देखना कितना दुखद है कि आम लोग, बच्चे तक, इसकी कीमत चुका रहे हैं जबकि नेता राजनीति खेल रहे हैं। कितने और फोन करने पड़ेंगे इससे पहले कि बमबारी असल में रुके?
एक और दिन, एक और टूटा हुआ वादा। ये देखना कितना दुखद है कि आम लोग, बच्चे तक, इसकी कीमत चुका रहे हैं जबकि नेता राजनीति खेल रहे हैं। कितने और फोन करने पड़ेंगे इससे पहले कि बमबारी असल में रुके?
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