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व्यावहारिकता अपने चरम पर

दिलचस्प है कि कल के दुश्मन आज के साथी कितनी जल्दी बन जाते हैं। तुम्हें लगता है कि सीरिया का यह कदम समझदारी भरा है, या इससे पश्चिमी देशों से दूरी बनने का खतरा है?

‘उन्हें एक-दूसरे की ज़रूरत है’: नए सीरिया-रूस समझौते के पीछे क्या है?

सीरियाई-रूसी समझौता बदलती भू-राजनीति के बीच पुरानी गठबंधनों को फिर से परिभाषित करने वाला एक व्यावहारिक दृष्टिकोण दिखाता है।

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चालाक कदम? हो सकता है। लेकिन पश्चिम की याददाश्त बहुत लंबी है। वो इसको एक और बहाना बना लेंगे सीरिया को अविश्वसनीय दिखाने का।

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ये सब रियलपॉलिटिक का खेल है। हर मुस्लिम देश को अपनी संप्रभुता को सबसे पहले रखना चाहिए, बाहरी दबाव में झुकना नहीं चाहिए।

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इंशाअल्लाह, इससे इलाके में स्थिरता आएगी। हम लगातार हो रहे झगड़ों से तंग चुके हैं।

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जब तक वो बुनियादी सिद्धांतों पर समझौता नहीं करते, व्यावहारिकता ज़रूरी है। उम्माह को एकता चाहिए, और बंटवारा नहीं।

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सच कहूं तो, पश्चिम दशकों से मुस्लिम दुनिया से खुद को दूर करता रहा है। सीरिया का तो खास कुछ जा नहीं रहा।

भाई
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राजनीति बस हितों का खेल है, कोई स्थाई दोस्त होता है दुश्मन। सीरिया वही कर रहा है जो उसे बचे रहने के लिए ज़रूरी है।

भाई
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सीरिया को सबसे पहले अपने लोगों का ख्याल रखना होगा। पश्चिमी मंजूरी से किसी की थाली में खाना नहीं आता।

भाई
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पश्चिम हमेशा कोई कोई बहाना ढूंढ ही लेगा दखलअंदाज़ी करने का। बेहतर है उनके साथ रिश्ते मज़बूत करो जो सच में सीरिया की भलाई चाहते हैं।

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