क्या अक़ीक़ा करना अनिवार्य है? ये हैं दलीलें, सबसे अच्छा समय, और बालिग़ होने के बाद अक़ीक़ा का हुक्म
अक़ीक़ा ज़्यादातर उलमा के मुताबिक़ सुन्नत-ए-मुअक्कदा इबादत है, जो बच्चे की पैदाइश पर शुक्राने के तौर पर की जाती है। कुछ उलमा का कहना है कि जो अदा करने की ताक़त रखता हो उस पर वाजिब है। इसकी दलीलों में इमाम मालिक और अहमद की रिवायत शामिल है।
अक़ीक़ा का मुख्य वक़्त जन्म के सातवें दिन है, लेकिन इसे चौदहवें या इक्कीसवें दिन तक भी टाला जा सकता है। माँ-बाप पर ये ज़िम्मेदारी तब तक रहती है जब तक बच्चा बालिग़ न हो जाए।
जो लोग बालिग़ होने तक अक़ीक़ा नहीं कर पाए, कुछ उलमा उन्हें ख़ुद अक़ीक़ा करने की तरग़ीब देते हैं, जबकि मजलिस तरजीह मुहम्मदिया का मानना है कि इसकी ज़रूरत नहीं, क्योंकि बालिग़ होने के बाद इसकी सुन्नत ख़त्म हो जाती है। नबी या सहाबा से बालिग़ होने के बाद ऐसा करने का कोई रिवायत नहीं है।
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