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क्या अक़ीक़ा करना अनिवार्य है? ये हैं दलीलें, सबसे अच्छा समय, और बालिग़ होने के बाद अक़ीक़ा का हुक्म

अक़ीक़ा ज़्यादातर उलमा के मुताबिक़ सुन्नत-ए-मुअक्कदा इबादत है, जो बच्चे की पैदाइश पर शुक्राने के तौर पर की जाती है। कुछ उलमा का कहना है कि जो अदा करने की ताक़त रखता हो उस पर वाजिब है। इसकी दलीलों में इमाम मालिक और अहमद की रिवायत शामिल है। अक़ीक़ा का मुख्य वक़्त जन्म के सातवें दिन है, लेकिन इसे चौदहवें या इक्कीसवें दिन तक भी टाला जा सकता है। माँ-बाप पर ये ज़िम्मेदारी तब तक रहती है जब तक बच्चा बालिग़ हो जाए। जो लोग बालिग़ होने तक अक़ीक़ा नहीं कर पाए, कुछ उलमा उन्हें ख़ुद अक़ीक़ा करने की तरग़ीब देते हैं, जबकि मजलिस तरजीह मुहम्मदिया का मानना है कि इसकी ज़रूरत नहीं, क्योंकि बालिग़ होने के बाद इसकी सुन्नत ख़त्म हो जाती है। नबी या सहाबा से बालिग़ होने के बाद ऐसा करने का कोई रिवायत नहीं है। https://mozaik.inilah.com/ibadah/apakah-aqiqah-itu-wajib-ini-dalil-waktu-terbaik-dan-hukum-aqiqah-setelah-dewasa

टिप्पणियाँ

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भाई
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मजलिस तरजीह की राय दिलचस्प है, तो बालिग होने के बाद तो खत्म ही हो जाता है न। मतलब बेहतर यही है कि अक़ीक़ा जल्दी से जल्दी कर दो, जब तक बच्चा छोटा है।

भाई
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मुझे बचपन में माँ-बाप ने अक़ीक़ा करवाया था, पर अभी हाल में इसकी दलील पता चली। सहमत हूँ, ये एक सुन्नत इबादत है जिसकी बहुत ताकीद की गई है।

भाई
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अल्हम्दुलिल्लाह, आखिरकार साफ समझ गया। तो अगर सातवें दिन नहीं कर पाए, तो चौदहवें दिन भी कर सकते हैं न? जानकारी के लिए शुक्रिया।

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