जब दुनिया का अंत भी हो जाए, तब भी अपने नेक काम करते रहो
अस्सलामु अलैकुम, भाइयों और बहनों। अनस इब्न मालिक ने बयान किया कि हमारे प्यारे नबी, अल्लाह उन पर रहमत और सलामती भेजे, ने फ़रमाया, “अगर क़यामत की घड़ी आ जाए और तुम्हारे हाथ में खजूर का एक पौधा हो, और घड़ी आने से पहले उसे लगाना मुमकिन हो, तो तुम उसे लगा दो।” ज़रा इसकी तस्वीर बनाने की कोशिश करो। आसमान फट रहा है। पहाड़ धूल में मिल रहे हैं। समंदर उफ़ान पर हैं। हमारे आस-पास सब कुछ बिखर रहा है जैसे आख़िरी लम्हा आ गया हो। सारी प्लानिंग, सारी ताक़त, सारे सपने-सब ख़त्म। और इस सारी तबाही के बीच, एक आदमी वहाँ खड़ा है अपने हाथ में एक छोटा-सा पौधा लिए। कोई हथियार नहीं। कोई दौलत नहीं। कोई तख़्त नहीं। बस एक नन्ही-सी, कमज़ोर ज़िन्दगी। दुनिया सचमुच ख़त्म हो रही है, लेकिन उसे ये हुक्म मिलता है: इसे लगा दो। हाँ, लगा दो। कितनी गहरी बात है ये? देखो, असल मुद्दा पेड़ का नहीं है। वो पेड़ कभी बढ़ेगा नहीं। उसकी डालियाँ ऊपर नहीं उठेंगी। कोई उसकी छाँव में नहीं बैठेगा, कोई बच्चे उस पर नहीं चढ़ेंगे, कोई परिंदे उसमें घोंसला नहीं बनाएँगे। फिर भी-उसे लगा दो। क्योंकि ईमान हमेशा इस बात का नाम नहीं कि हमें बदले में क्या मिलता है। ईमान का मतलब है हुक्म मानना, चाहे कामयाबी नामुमकिन लगे। ईमान का मतलब है उम्मीद पकड़े रखना जब ये बेवकूफ़ी लगे। ईमान का मतलब है रचने का फ़ैसला करना, जबकि सब कुछ ढह रहा हो। कोई भी मेहनत कर सकता है जब अंत में साफ़ इनाम नज़र आ रहा हो। कोई भी लगा रह सकता है जब उसे पता हो कि वो फ़सल देखेगा। लेकिन एक मोमिन से कुछ और माँगा जाता है: सिर्फ़ इसलिए नेकी करना क्योंकि वो नेकी है, बनाना इसलिए क्योंकि बनाना सही काम है, पौधा लगाना इसलिए क्योंकि लगाना इबादत है। भले ही आसमान गिर रहा हो। भले ही आने वाला कल न हो। भले ही सूर फूँके जाने वाला हो। लगा दो। एक ऐसी दुनिया में जो अक्सर नाउम्मीदी में अटकी लगती है, ये सच्ची हिम्मत का काम है। उन वक़्तों में जब हर कोई जल्दी नतीजे चाहता है, ये बहादुरी है। जब वसवसे कहते हैं कि किसी चीज़ की अहमियत नहीं, ये एक ज़बरदस्त याद दहानी है कि नेकी हमेशा मायने रखती है। वो छोटा-सा पौधा हर छोटी नेकी है जो तुम करते हो। हर नमाज़। हर सच्ची बात। किसी के दर्द को ठीक करने की हर कोशिश। इस दुनिया को थोड़ा बेहतर बनाने की हर जद्दोजहद। मोमिन पौधा इसलिए नहीं लगाता कि उसे यक़ीन है कि वो फल देखेगा, बल्कि इसलिए कि उसने पूरी तरह उस ज़ात पर भरोसा किया है जिसने उसे लगाने का हुक्म दिया। तो हमारी आख़िरी साँस तक, हमारे दिल की धड़कन रुकने तक, यहाँ तक कि तारों के बुझने तक, हमारा मिशन एक ही है: बनाना। सेवा करना। प्यार करना। रचना। लगाना। क्योंकि हमेशगी के बिल्कुल किनारे पर, ईमान नाउम्मीदी के आगे घुटने नहीं टेकता। वो एक आख़िरी बार मिट्टी में हाथ डालता है और ज़िन्दगी का एक बीज पीछे छोड़ जाता है। पढ़ने के लिए जज़ाकअल्लाहु ख़ैरन-अल्लाह हमारे दिनों को ऐसी सच्ची कोशिशों से भर दे, आमीन।