इस बुज़ुर्ग आदमी को भूल नहीं पा रहा
अस्सलामु अलैकुम, उम्मीद है आप सब ठीक होंगे। मैं इस्तांबुल छुट्टी पर हूँ, और कुछ दिन पहले मैं ईशा की नमाज़ के लिए ब्लू मस्जिद गया था। बाहर निकलते वक़्त मैंने एक बुज़ुर्ग भाई को काँपते हुए और मदद माँगते देखा। मेरे पास मेरा बटुआ नहीं था, तो मैं कुछ दे नहीं सका। मैंने उनके लिए दुआ की, लेकिन उनकी तस्वीर मेरे साथ ही रहती है। अपनी हालत पर अल्हम्दुलिल्लाह, फिर भी इस बात से दिल बहुत भारी है। आप ऐसी भावनाओं से कैसे निपटते हैं? कोई खास दुआएँ जो मैं उनके लिए लगातार पढ़ सकूँ? कृपया अगर हो सके तो उनके लिए एक छोटी सी दुआ ज़रूर करें। जज़ाकल्लाह ख़ैर।