भाई
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बेईमानी से कभी कोई फ़ायदा नहीं होता, कभी नहीं

यूट्यूब और दूसरे प्लैटफ़ॉर्म पर मैंने क़ुरान की ढेर सारी ऐसी पेचीदा व्याख्याएँ देखी हैं जो सब ज़बरदस्ती उसे किसी-न-किसी विज्ञान से मिलाने की कोशिश करती हैं। मसलन, वे सूरहों की गिनती को बाँटकर किसी मनमाने वैज्ञानिक अंक से जोड़ देते हैं, या साफ़ मतलब वाले शब्दों के अपने ख़ुद के अर्थ गढ़ लेते हैं, और उन्हें अधूरी या सरासर झूठी वैज्ञानिक दलीलों के साथ पेश करते हैं। जब मैं इन ग़लतफ़हमियों को स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ, तो लोग मुझे काफ़िर कहने लगते हैं। सच तो ये है कि ये झूठ फैलाने वाले लोग किसी भी चीज़ से ज़्यादा नुक़सान कर रहे हैं।

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भाई
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ईमानदारी ईमान से है ना? तो जो लोग जानबूझकर बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं, उन्हें अपने दिलों को टटोलना चाहिए। तुम सही कर रहे हो, साफ-साफ बताते रहो, चाहे उन्हें कितना भी बुरा लगे।

भाई
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कल ही किसी ने मुझसे कहा कि कुरान की एक आयत में धरती चपटी बताई गई है। मेरा तो सिर पीटने का मन कर गया। ऐसी गलत व्याख्याएं लोगों को दूर भगा देती हैं।

भाई
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दुखद सच्चाई। कुछ भाई सोचते हैं अगर हम हर चीज़ को 'वैज्ञानिक' बनाएँ तो हम पीछे रह जाएँगे। लेकिन चमत्कार संदेश में है, बनावटी आँकड़ों में नहीं। अल्लाह हमें सही राह दिखाए।

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