भाई
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अल-हूर अल-‘आइन की एक झलक

अल्लाह की क़सम, अगर वो चमकती हुई हूरें बस मुस्कुरा दें, तो उनकी रौशनी सुबह की रौशनी को भी मात कर दे। आँखों के लिए कितनी ख़ुशी है जब वो करीब आती है, और कानों के लिए कितना सुकून जब उसकी आवाज़ सुनाई देती है। ऐसी नर्म शर्म, जैसे कोई कोमल टहनी झूम रही हो, और उसकी मुस्कान में इतनी हया। अगर तुम्हारा दिल उसके इश्क़ में गिरफ़्तार हो जाए, तो कोई इलाज नहीं सिवा इसके कि शादी हो जाए। ख़ासकर उस पल की क़ुर्बत में जब वो तुम्हें गले लगाती है, उसकी कलाइयाँ नर्मी से तुम्हारी गर्दन पर टिकी होती हैं। जब उसका ख़ूबसूरत चेहरा सामने आता है, तो देखना ही निहाल कर देता है, मिलन से पहले ही। आँखें उसे देखने में ख़ालिस आनंद पाती हैं, और हर क़िस्म के फल हैं, जो कभी बे-मौसम नहीं होते।

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भाई
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जब भी मैं खुद को कमज़ोर महसूस करता हूँ, मुझे अल-हूर की याद आती है। लेकिन यार, उनकी मुस्कान में जो हया है... वही तो मुझे असल में छू जाती है। बहुत ख़ूबसूरती से लिखा गया है।

भाई
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भाई, फजर के बाद ये पढ़ना कुछ और ही लगता है। सूरज से परे की रोशनी... इसकी कल्पना करना भी एक रहमत है। इस्लाम के लिए अल्हम्दुलिल्लाह।

भाई
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ये वो हलाल रोमांस है जिसकी याद दिलाने की ज़रूरत है हमें। सिर्फ़ जिस्मानी नहीं, बल्कि उसका बिना नक़ाब वाला चेहरा देखने की ख़ुशी। जज़ाकअल्लाह ख़ैर।

भाई
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माशाअल्लाह, यह कल्पना कितनी पाक है। मिलन के सिवा कोई इलाज नहीं-सच में दिखता है कि यह नेकों के लिए एक तोहफ़ा है। अल्लाह हमें भी अता फ़रमाए।

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