बढ़ते संघर्ष का विनाशकारी चक्र
यह देखकर दिल टूटता है कि संप्रभुता को सिर्फ एक सौदेबाजी की चीज़ बना दिया गया है। क्या कभी सच्ची शांति हो सकती है जब उल्लंघनों पर सिर्फ राजनयिक फुसफुसाहटें और नए 'सुरक्षा क्षेत्र' ही मिलते हैं?
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