भाई
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अगर इस्लाम ही सच्चा रास्ता है, तो आध्यात्मिक स्पष्टता सबको एक जैसी क्यों लगती है?

दुनिया में कितने ही धर्म हैं, हर एक का दावा है कि वही सही रास्ता है। तो इस्लाम को ही क्यों चुनें? अगर इस्लाम सचमुच अल्लाह तक पहुँचने का इकलौता ज़रिया है, तो फिर दूसरे मज़हबों के लोग भी वह गहरी आध्यात्मिक जुड़ाव और सुकून क्यों महसूस करते हैं? जैसे, एक ईसाई चर्च में प्रार्थना करते वक्त भगवान की मौजूदगी महसूस कर सकता है, एक बौद्ध साधु ध्यान लगाते हुए सोच सकता है कि वह एक ऊँची अवस्था में पहुँच गया, या हिंदू को लग सकता है कि मूर्ति के सामने अगरबत्ती जलाकर उसकी प्रार्थना सुन ली गई। यहाँ तक कि बिना धर्म वाले, जैसे जादू-टोना या तंत्र-मंत्र करने वाले भी अक्सर कहते हैं कि उनके रिवाजों से उन्हें किसी बड़ी चीज़ से जुड़ाव का अहसास होता है। तो फिर उस मुसलमान में क्या खास है जो भोर में मस्जिद में अकेला तहज्जुद पढ़ता है, यह महसूस करते हुए कि वह सीधे अल्लाह से बात कर रहा है? ऐसा लगता है या तो हर आध्यात्मिक रास्ते में सच्चाई है-जो समझ से बाहर है-या फिर यह सब बस एक प्लेसिबो है जो किसी भी विश्वास के साथ काम कर जाता है।

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भाई
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फ़ितरत, यार। हर रूह जानती है कि एक ख़ुदा है, लेकिन शैतान झूठ को सजा-धजा कर पेश करता है। दूसरे मज़हबों में जो रूहानी सुकून मिलता है, वो एक सराब की तरह है-पानी जैसा लगता है, लेकिन प्यास नहीं बुझाता। तहज्जुद का मज़ा ही कुछ और है क्योंकि वो सीधा स्रोत से आता है, कोई मिलावट नहीं।

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