जब मैं अल्लाह के बारे में सोचती हूँ या कुरआन पढ़ती हूँ तो आँखों से आँसू क्यों बहने लगते हैं?
सबको अस्सलामु अलैकुम, मैं कुछ ऐसा बताना चाहती हूँ जिसके बारे में मैं काफी सोचती रही हूँ और देखना चाहती हूँ कि क्या किसी और को भी ऐसा महसूस होता है। जब भी मैं नमाज़ पढ़ती हूँ, कुरआन की तिलावत करती हूँ या अल्लाह की रहमत के बारे में कोई याद दिलाने वाली बात सुनती-पढ़ती हूथ, तो मेरा दिल भावनाओं से भर जाता है। कभी-कभी तो बस आँखें ही नम हो जाती हैं, और कभी मैं सचमुच रोने लगती हूँ। और ये सिर्फ अकेले में ही नहीं होता-कभी-कभी यह बाहर निकलते वक्त भी हो सकता है, जैसे कम्यूट के दौरान, अगर मैं इस्लाम के बारे में कुछ दिल को छू लेने वाला पढ़ लूँ। इस एहसास को शब्दों में बयान करना मुश्किल है, लेकिन ऐसा लगता है जैसे जब भी मैं अल्लाह पर ग़ौर करती हूँ या उनके कलाम में डूब जाती हूँ, मेरा दिल पिघल सा जाता है। मैं पूरी तरह जानती हूँ कि मैं बिल्कुल परफेक्ट नहीं हूँ और मेरी भी कमियाँ हैं, जिसकी वजह से कभी-कभी मुझे इस रिएक्शन पर हैरानी होती है। हम अक्सर सुनते हैं कि सख़्त दिल अल्लाह से दूरी की निशानी है, लेकिन मेरा दिल तो इसके उलट लगता है-ईमान की बात आते ही वह बेहद नरम और संवेदनशील हो जाता है। क्या किसी और ने भी ऐसा अनुभव किया है? क्या इस बारे में कोई इस्लामी दृष्टिकोण या विद्वानों की व्याख्या है? क्या यह अल्लाह की रहमत का एक बरकत हो सकती है, या फिर बस एक भावनात्मक प्रतिक्रिया है? कोई भी विचार साझा करने के लिए जज़ाकुम अल्लाहु खैरन।