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कुरान सूरह अर-रहमान आयत 33 का अर्थ: इंसान, ज्ञान, और क्षमता की सीमा

अल्लाह SWT ने सूरह अर-रहमान आयत 33 में फरमाया: 'ऐ जिन्न और इंसान के गिरोह! अगर तुम आसमान और ज़मीन के छोर को पार कर सकते हो, तो पार करो। तुम उसे पार नहीं कर सकते मगर अल्लाह की ताक़त से।' यह आयत इंसानों और जिन्नों को अपनी क्षमताओं पर सोचने और ब्रह्मांड की खोज करने का आह्वान करती है। इंडोनेशिया का धार्मिक मामलों का मंत्रालय बताता है कि यह आयत एक तरह की चुनौती है-अगर तुममें हिम्मत है तो आसमान-ज़मीन की सीमाएं पार करो, लेकिन अल्लाह की ताक़त के बिना ये नामुमकिन है। कुछ मुफस्सिरीन "सुल्तान" शब्द को इल्म या ज्ञान के तौर पर समझते हैं, जो इंसान के लिए वो ज़रिया बना जिससे वो पहले मुश्किल चीज़ों को तकनीक के ज़रिए हासिल कर सके, जैसे आज कल की स्पेस एक्सप्लोरेशन। इस्लाम में विज्ञान और ज्ञान की तरक्की को घमंड की तरह नहीं देखा जाता, बल्कि ये अल्लाह की अज़मत का सबूत है जिसने इंसान को अक़्ल अता की। लेकिन ये आयत हमें याद दिलाती है कि इंसानी ताक़त की एक हद है; चाहे तकनीक कितनी ही तरक्की क्यों कर ले, आखिरकार इंसान अल्लाह SWT पर ही मुनहसिर है। आज के दौर में ये आयत ख़ास तौर पर मुनासिब है ताकि तरक्की और ईमान के बीच तालमेल बैठ सके, और ये एहसास रहे कि सारी ताक़तें बस अल्लाह ही की ओर से हैं। https://mozaik.inilah.com/dakwah/bisakah-manusia-melintasi-penjuru-langit-dan-bumi-ini-makna-mendalam-qs-ar-rahman-ayat-33

टिप्पणियाँ

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भाई
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सुल्तान विज्ञान के रूप में, उसकी व्याख्या कमाल की है। लेकिन फिर भी ये अल्लाह की कुदरत से अलग नहीं हो सकता। उम्मीद है और भी मुसलमान बड़े-बड़े वैज्ञानिक बनें।

भाई
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ज़बरदस्त, ये आयत सुनकर तो रूह कांप जाती है। कितनी भी एडवांस्ड स्पेस टेक्नोलॉजी हो, उसे भी अल्लाह की इजाज़त चाहिए होती है। तो याद रखो, इंसान की कोई औकात नहीं उसकी रज़ा के बिना।

भाई
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हमेशा याद दिलाया जाता है, हम कितने भी बड़े क्यों बन जाएं, हमारी सीमाएं हैं। Thanks for sharing, अब समझ आया विज्ञान और ईमान का रिश्ता।

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