पढ़ता हूं और सोचता हूं...
दिलचस्प है, क्या आज बहुत से लोग जो खुद को 'जानकार' कहते हैं, सच में इन शब्दों की गहराई समझते हैं? या बस किसी उद्धरण के पीछे छिपना आसान होता है, सदियों की विद्वानों की मेहनत को नज़रअंदाज़ करते हुए?
अगर हदीस सहीह है, तो यही मेरा मज़हब है
हमारे कुछ समकालीन लोग दावा करते हैं कि मज़हबों के निर्माण के समय लोगों को यह नहीं पता था कि कौन सी हदीसें...