अगर हम एक मक्खी भी नहीं बना सकते, तो अल्लाह के सामने हमारी औकात क्या है?
कभी-कभी क़ुरआन में अल्लाह हमें सिर्फ़ बताता नहीं है। वो हमें रुकने पर मजबूर कर देता है। एक जुमले से हमारा घमंड चूर-चूर कर देता है। हमारी वो हर झूठी ताकत छीन लेता है जो हमने अपने लिए खड़ी कर रखी है। उन पलों में से एक है ये चुनौती: "बेशक, जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पुकारते हो, वो एक मक्खी भी पैदा नहीं कर सकते, चाहे वो सब मिलकर भी ऐसा करने की कोशिश कर लें।" एक मक्खी। मक्खी ही क्यों? पहाड़ क्यों नहीं? या सूरज? या आसमान? क्योंकि अल्लाह हमें अपने बारे में एक डरावनी सच्चाई दिखाना चाहता था। अगर वो कहता कोई आकाशगंगा बनाओ, तो हम बस सिर हिलाकर कहते, "हाँ, हम नहीं बना सकते।" अगर वो कहता समंदर बनाओ, तो हम मान लेते। लेकिन मक्खी? अरे, अपनी सारी अक्ल, सारी साइंस, सारी टेक्नॉलजी के बल पर, क्या हम सच में ऐसा नहीं कर सकते? हमने एटम को तोड़ दिया। हमने इंसानी जीनोम का नक्शा बना डाला। हम दिल के ट्रांसप्लांट करते हैं। हम अपने सौर-मंडल के पार मशीनें भेजते हैं। हम ऐसे कंप्यूटर बनाते हैं जो सेकंडों में सवालों के जवाब दे देते हैं। हम AI पर कितना फ़ख्र करते हैं। हम हर नई खोज का जश्न मनाते हैं। फिर अल्लाह एक सवाल पूछता है जो हर तहज़ीब की बोलती बंद कर देता है: क्या तुम मक्खी बना सकते हो? सुधारो नहीं। क्लोन मत करो। इसका DNA कॉपी मत करो। जो पहले से है, उसे इधर-उधर मत करो। बनाओ। जहाँ कुछ नहीं था, वहाँ ज़िंदगी ले आओ। मुर्दा चीज़ों से कहो ज़िंदा हो जाओ। उसे आँखें दो जो किसी इंजीनियर ने डिज़ाइन नहीं कीं। पंख जो किसी फ़ैक्ट्री ने नहीं बनाए। फ़ितरत जो किसी उस्ताद ने नहीं सिखाई। भूख। डर। मक़सद। ज़िंदगी। कोई लैब नहीं कर सकती। कोई बादशाह हुक्म नहीं दे सकता। कोई साइंटिस्ट बना कर नहीं दे सकता। कोई अरबपति इसे खरीद नहीं सकता। क्योंकि कुछ बनाने और ज़िंदगी पैदा करने में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है। हर इजाद जिसे लोगों ने सराहा, उसके लिए मसाला अल्लाह का बनाया हुआ था। हर फ़ार्मूला उन क़ानूनों पर टिका है जो अल्लाह ने कायनात में लिख दिए। हर तेज़ दिमाग़ इसलिए है क्योंकि अल्लाह ने वो दिमाग़ बनाया जो सोचता है। हर खोज बस उस चीज़ को ज़ाहिर करना है जो अल्लाह ने हमसे बहुत पहले रख दी थी। हमारे पास अपना कुछ नहीं है। हम किसी चीज़ की असल मालिक नहीं रखते। हम सिर्फ तरतीब बदलते हैं। अल्लाह पैदा करता है। फिर आता है वो हिस्सा जो हर दिल को हिला कर रख दे। अल्लाह कहता है कि अगर एक मक्खी उनसे कुछ छीन ले, तो वो वापस भी नहीं पा सकते। ज़रा सोचो। ये मामूली सी चीज़ तुम्हारे खाने पर बैठती है। कुछ इतना छोटा ले जाती है जो नज़र नहीं आता। और दुनिया के बेहतरीन साइंटिस्ट भी अलग नहीं कर सकते कि उसने ठीक क्या लिया और क्या छोड़ा। अल्लाह ने मक्खी इसलिए नहीं चुनी कि वो छोटी है। इसलिए चुनी कि जिसे हम छोटा समझते हैं, वो हमारी ताकत से बहुत ऊपर है कि हम सच में बना सकें। और अगर हम उसकी मख़लूक का सबसे छोटा हिस्सा भी नहीं बना सकते, तो पैदा करने वाला कितना बड़ा होगा? अब ख़ुद से पूछो: तुम्हारी आँखें किसने बनाईं? सिर्फ़ शक्ल नहीं-उन्हें देखना किसने सिखाया? करोड़ों सैल अंदर किसने बनाए? दिमाग़ को किसने सिखाया अपनी माँ का चेहरा पहचानना? जीभ को किसने सिखाया ठीक से हरकत करना ताकि बिना सोचे-समझे अल्फ़ाज़ निकल पड़ें? दिल को किसने सिखाया तुम्हारी पहली साँस से पहले धड़कना? जब तुम सोते हो तो कौन इसे धड़कता रखता है? आज रात, तुम आँखें बंद करोगे। अपना जिस्म नींद के हवाले करोगे। एक भी दिल की धड़कन को कहने नहीं जाओगे कि चल। फेफड़ों को याद नहीं दिलाओगे साँस लेने को। गुर्दों को काम करने को नहीं कहोगे। जिगर को हिदायत नहीं दोगे। तुम पूरी तरह बेबस होगे। और फिर भी, अल्लाह तुम्हें जिलाता रहेगा। हर धड़कन एक तोहफ़ा है। हर साँस एक तोहफ़ा है। हर सुबह जब तुम जागते हो, एक तोहफ़ा है। ऐसे कितने तोहफ़े हमने बिना "अल्हम्दुलिल्लाह" कहे ले लिए? कितनी नमाज़ें हमने टाल दीं जबकि हमारे दिल सिर्फ़ इसलिए धड़कते रहे क्योंकि अल्लाह ने उन्हें इजाज़त दी? कितने गुनाह हमने उन आँखों से किए जो उसने दीं, हाथों से जो उसने दिए, ताकत से जो उसने दी, वक़्त से जो उसने दिया? और फिर हम सोचते हैं हम ख़ुद-मुख़्तार हैं। शैतान का सबसे बड़ा धोखा ये नहीं था कि लोगों को लगे अल्लाह है ही नहीं। बल्कि ये था कि लोग सोचें उन्हें उसकी ज़रूरत नहीं। लेकिन ख़ुद से ईमानदार रहो। अपनी दौलत छीन लो। अपनी सेहत छीन लो। अपनी इज़्ज़त छीन लो। अपना ख़ानदान छीन लो। अपनी अगली साँस छीन लो। बाकी क्या बचता है? कुछ नहीं। हम इस दुनिया में आए थे ख़ुद को खिलाने से मजबूर, चलने से मजबूर, बोलने से मजबूर। और एक दिन, ऐसे ही चले जाएँगे। दूसरे हमें उठाएँगे। दूसरे हमें नहलाएँगे। दूसरे हमारे लिए दुआ करेंगे। दूसरे हमें ज़मीन में रखेंगे। दूसरे वापस चल देंगे। हमारे साथ रहने वाला सिर्फ अल्लाह है। वो रब जिसने हमें मक्खी के ज़रिए चुनौती दी, वही रब कहता है: "ऐ मेरे बंदो, जिन्होंने अपने ऊपर ज़ुल्म किया, अल्लाह की रहमत से मायूस मत हो।" क्या तुम्हें उसकी रहमत नज़र आती है? जिसका हम पर कोई हक़ नहीं, वो हमें बुलाता है। जिसकी अज़मत हमारे दिमाग़ नहीं समझ सकते, वो हमें "मेरे बंदे" कहता है। इसलिए नहीं कि उसे हमारी ज़रूरत है-बल्कि इसलिए कि उसे अच्छा लगता है कि हम लौट आएँ। तो अगर तुम्हारा दिल सख़्त हो गया है, लौट आओ। अगर तुम्हारे गुनाह ज़्यादा हैं, लौट आओ। अगर तुम्हें लगता है बहुत दूर निकल आए, लौट आओ। क्योंकि तुम्हारे गुनाह उसकी रहमत से बड़े नहीं हैं। तुम्हारी नाकामियाँ उसकी मग़फ़िरत से बड़ी नहीं हैं। तुम्हारी कमज़ोरी ही तो वजह है कि वो तुम्हें बुला रहा है। क़ब्र में जाने तक इंतज़ार मत करो ये एहसास करने के लिए कि तुम कितने मामूली हो। अभी एहसास करो। अपना सर झुका दो, इससे पहले कि झुकाया जाए। अपना दिल नरम कर लो, रुकने से पहले। रो लो, उस दिन से पहले जब आँखें आँसू नहीं बहा पाएँगी। क्योंकि एक दिन, हर उपाधि जाती रहेगी। हर कामयाबी जाती रहेगी। हर फ़ॉलोअर, हर डॉलर, हर डिग्री, हर ताली, तुम्हारी हर चीज़-ग़ायब। और मक्खी बनाने वाले रब के सामने खड़े होकर, तुम्हें एहसास होगा: तुम्हारा सबसे बड़ा शरफ़ तुम्हारा करियर नहीं था, न दौलत, न नाम। बल्कि ये था कि ज़मीन-आसमान के पैदा करने वाले ने तुम्हें इजाज़त दी उसे "मेरा रब" कहने की। और उसने ख़ुद को इजाज़त दी तुम्हें "मेरा बंदा" कहने की। इससे बड़ा कोई शरफ़ नहीं। तो उसकी तरफ़ लौट आओ, इससे पहले कि आख़िरी धड़कन, जो वो इतने वक़्त से तुम्हें देता आया है, वो हो जाए जिसे वो न देने का चुनाव करे।