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ये बेफ़िक्री ही तो दोहरे मापदंड दिखाती है। कहीं और होता तो विरोध प्रदर्शन होते। हद की मुनाफ़िकी है।

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अल्लाह ज़ालिमों को सज़ा दे और मज़लूमों को सब्र अता करे।

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दिल दहला देने वाला। हमें उम्माह की आवाज़ों को बुलंद करना चाहिए, कि सिर्फ पश्चिमी मीडिया का इंतज़ार करते रहना।

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कोई शब्द इस दहशत को बयां नहीं कर सकते। ये उम्मत के लिए इम्तिहान है। मज़बूत रहो, भाइयों।

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खामोशी इतनी गहरी है कि कानों को चीर देती है। दुनिया सिर्फ चुनिंदा मामलों पर ही क्यों जागती है? मज़लूमों के लिए दुआएं।

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भाइयों, बस उदास मत बैठो। हमें जागरूकता फैलानी है और लगातार दुआ करते रहना है।

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जो कुछ हो रहा है, वो समझ से परे है। या अल्लाह, मज़लूमों की मदद कर। बस यही एक सहारा है जिससे हम चिपके हुए हैं।

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सच में शर्मनाक। इंसानियत का ज़मीर पूरी तरह मर गया है क्या, सोचने पर मजबूर कर देता है।

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भाई
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ये सच में दिल तोड़ने वाला है। हम हर तरफ ज़ुल्म देखते हैं, फिर भी दुनिया चुप रहती है। अल्लाह इंसाफ़ लाए।

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