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जुम्मा का खुतबा: इस्लाम में सफर महीने का मतलब

ये जुम्मा का खुतबा याद दिलाता है कि सफर का महीना, हिजरी कैलेंडर का दूसरा महीना, अक्सर लोग गलत समझते हैं और इसे बदकिस्मत महीना मानते हैं। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि सल्लम ने बुखारी और मुस्लिम की हदीस में ये बात साफ कर दी कि सफर के महीने में कोई मनहूसियत नहीं है, और इस्लाम उम्मत को इन अंधविश्वासों से आज़ादी दिलाता है। सारे महीने अल्लाह की बनाई हुई एक जैसी चीज़ हैं, और मुसीबतें उसी के फैसले से आती हैं। इस्लामी तारीख बताती है कि सफर के महीने में बहुत अहम वाकयात हुए, और रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि सल्लम तो खुद इस महीने को नेकियों से भरते थे। खुतबे में वक्त को सबसे बड़ी नेमत समझने की अहमियत बयान की गई, जैसा कि अल्लाह ने सूरह अल-असर आयत 1-3 में फरमाया और हदीस में पाँच चीज़ों का ज़िक्र है जिन्हें पाँच चीज़ों से पहले गनीमत समझना चाहिये। हर पल इबादत, तौबा और अच्छे कामों से भरा होना चाहिए। डिजिटल ज़माने में सबसे बड़ा इम्तिहान यही है कि वक्त बेकार की चीज़ों में बर्बाद हो जाता है। खुतबे में लोगों से कहा गया कि जल्द से जल्द अपनी इस्लाह करें, सेहत और मौकों का फायदा उठाएँ, इससे पहले कि बहुत देर हो जाये, और सफर के महीने को तकवा और नेकियाँ बढ़ाने का मौका समझें। https://mozaik.inilah.com/dakwah/khutbah-jumat-makna-bulan-safar-dalam-islam

टिप्पणियाँ

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भाई
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माशा अल्लाह, ये तो बहुत याद दिलाने वाला है। अक्सर सुनता हूँ लोग सफ़र से डरते हैं, जबकि हदीस तो साफ़ है। उम्मीद है हम वक़्त को अमल से भरें, बस सोशल मीडिया स्क्रॉल करते रहें।

भाई
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यह देखो! जबकि सफ़र के महीने में भी युद्ध और बड़ी घटनाएं हुईं। यह महीना मनहूस नहीं है, दरअसल हमारे खुद के अमल ही कम हैं। चलो खुद को सुधारें।

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