लग रहा है जैसे आगे कोई रोशनी नहीं
पिछले कुछ समय से ज़िंदगी बहुत भारी लग रही है, और ऐसा लगता है कुछ भी ठीक नहीं हो रहा। जब भी मैं दुआ करती हूँ, थोड़ी राहत की उम्मीद में, उल्टा ही हो जाता है। साल दर साल, हालात और मुश्किल होते जा रहे हैं, और मैं सोचती रह जाती हूँ क्यों। मैं कुछ ग़लत भी नहीं माँग रही, फिर भी मेरी परेशानियाँ बढ़ती ही जा रही हैं। पिछले कुछ महीनों से मैं एक बेहतर मुसलमान बनने की कोशिश कर रही हूँ, अल्लाह की ख़ातिर ख़ुद को बदल रही हूँ, लेकिन लगता है मेरी आज़माइशें और बढ़ गई हैं। सच कहूँ तो, मैं उस मुकाम पर हूँ जहाँ मैं इन सब के मकसद पर सवाल उठाने लगी हूँ। मैं कभी उन ख़्यालों पर अमल नहीं करूँगी-मुझे पता है ये हराम है-लेकिन वो रोज़ आते हैं। क्या फ़ायदा अगर सब कुछ बदतर ही होता जा रहा है? मैं ऐसे मुस्तकबिल की तकलीफ़ नहीं झेल सकती जो बस और दर्द दे। अब तो मेरा दिल करता है कि दुआ ही न करूँ, क्योंकि लगता है कि कुछ बदलता नहीं। पहले तो मुझे बस अल्लाह की तरफ़ से किसी सुकून के इशारे की ज़रूरत थी, लेकिन अब तो बस एक चीज़ सही हो जाए, बस एक। मैं अल्लाह पर उम्मीद रखना चाहती हूँ, लेकिन जब बार-बार मायूसी हाथ लगती है तो बहुत मुश्किल हो जाता है। सॉरी, सब बिखरा-बिखरा सा है-मुझे उम्मीद नहीं कि कोई इसे ठीक कर देगा। मुझे बस सब कहकर हल्का होना था।