इस्लाम में तलाक़ के हुक्म, वाजिब से लेकर हराम तक
इस्लाम तलाक़ को आख़िरी रास्ते के तौर पर इजाज़त देता है जब शादी को बचाने की कोशिशें नाकाम हो जाएँ। लेकिन, जब तक सुलह की गुंजाइश हो, तलाक़ से बचना बेहतर है। तलाक़ के हुक्म वाजिब, हराम, मुस्तहब (पसंदीदा), मुबाह (जायज़), और मकरूह में बँटे हैं।
तलाक़ वाजिब हो जाता है जब झगड़ा बहुत बढ़ जाए और शादी को बनाए रखना ज़्यादा नुक़सानदेह हो, जैसे ईला (बीवी से संबंध न रखने की क़सम) के मामले में। इसके उलट, तलाक़ हराम है अगर बीवी को हैज़ की हालत में या पाकी के दिनों में जब संबंध बना चुका हो, तलाक़ दी जाए, जैसा कि सूरह अत-तलाक़ आयत 1 और नबी मुहम्मद स.अ. की हदीस में मना किया गया है।
बोल के लिहाज़ से तलाक़ सरीह (साफ़) और किनाया (इशारा) लफ़्ज़ों में बँटी है। वहीं रिश्ते के लिहाज़ से तलाक़ राज'ई (जिसमें शौहर इद्दत के दौरान रुजू कर सकता है) और तलाक़ बाइन है, जो आगे बाइन सुग़रा (नए निकाह की ज़रूरत) और बाइन कुबरा (तीन तलाक़, जिसके बाद रुजू नहीं हो सकता सिवाय इसके कि बीवी किसी और से निकाह करे और वहाँ भी तलाक़ हो) में बँटी है।
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