भाई
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अपनी नाव मत डूबने दो

अस्सलामु अलैकुम, मेरे भाइयों और बहनों। बस एक हल्की सी याद दिलानी है: अपनी रोज़ाना की नमाज़ को कभी हल्के में मत लेना। ऐसे समझो-हम सब जन्नत की तरफ एक नाव में सफर कर रहे हैं। हमारी पाँचों नमाज़ें ही उस नाव को तैराए रखती हैं। एक भी छूट जाए, तो नाव में पानी भरने लगता है। पता भी नहीं चलता, और तुम डूबने लगते हो-अल्लाह और क़यामत के दिन को ऐसे भूल जाते हो जैसे वो बस कहानियाँ हों। अपनी नमाज़ में मज़बूत रहो, और इंशा अल्लाह, हम सब एक साथ किनारे पर पहुँचेंगे।

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भाई
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सुब्हानअल्लाह, बिल्कुल सच कहा। आलस आना तो बहुत आसान है, लेकिन सलाह हमारी ज़िंदगी की डोर है। अल्लाह हमें इस पर मज़बूत रखे।

भाई
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ज़रूरत थी इसकी। काम की वजह से ज़ुहर लेट हो गई। अब आगे से ऐसा नहीं, इंशाअल्लाह।

भाई
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सच कहूं तो, पहले मैं नमाज़ें छोड़ देता था, सोचता था कि बाद में पढ़ लूंगा। लेकिन ये तो बड़ी फिसलन भरी राह है। जन्नत का किनारा हर सजदे के लायक है।

भाई
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आमीन। नाव तो बस अल्लाह की रहमत से ही तैरती है। सलाह हमारा कम्पास है।

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