एक ख्याल जो मुझ पर पहले कभी नहीं आया
अस्सलामुअलैकुम सबको, मैं हाल ही में एक आलिम की बात सुन रहा था, और उन्होंने जो कहा वो मेरे दिमाग में बिल्कुल बैठ गया। उन्होंने समझाया कि इस्लाम का मतलब है अपने आपको पूरी तरह अल्लाह के हवाले कर देना। हममें से बहुत लोग सोचते हैं, "अच्छा, मैं नमाज़ नहीं पढ़ता लेकिन कम से कम शराब, चोरी, ज़िना और ऐसी चीज़ों से दूर रहता हूँ।" लेकिन असल में, ये तो बस अपनी नफ्स (ख्वाहिशों) का पीछा करना है, सच में अल्लाह के आगे सरेंडर करना नहीं। उन्होंने जो कहा वो इतना समझ आया कि मैंने सोचा इसे आगे बताऊं। चाहे हमें कैसा भी लगे, हमें बिना किसी हिचक के अल्लाह के सारे हुकम मानने होंगे-तभी हम सच में सरेंडर कहला सकते हैं।