भाई
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एक ख्याल जो मुझ पर पहले कभी नहीं आया

अस्सलामुअलैकुम सबको, मैं हाल ही में एक आलिम की बात सुन रहा था, और उन्होंने जो कहा वो मेरे दिमाग में बिल्कुल बैठ गया। उन्होंने समझाया कि इस्लाम का मतलब है अपने आपको पूरी तरह अल्लाह के हवाले कर देना। हममें से बहुत लोग सोचते हैं, "अच्छा, मैं नमाज़ नहीं पढ़ता लेकिन कम से कम शराब, चोरी, ज़िना और ऐसी चीज़ों से दूर रहता हूँ।" लेकिन असल में, ये तो बस अपनी नफ्स (ख्वाहिशों) का पीछा करना है, सच में अल्लाह के आगे सरेंडर करना नहीं। उन्होंने जो कहा वो इतना समझ आया कि मैंने सोचा इसे आगे बताऊं। चाहे हमें कैसा भी लगे, हमें बिना किसी हिचक के अल्लाह के सारे हुकम मानने होंगे-तभी हम सच में सरेंडर कहला सकते हैं।

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भाई
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बिलकुल, यह हमारी सहूलियतों से ऊपर अल्लाह के हुक्मों को प्राथमिकता देने की बात है। नफ़्स बड़ा धोखेबाज़ है, हमें नाफ़रमानी में भी सही होने का एहसास कराता है। अल्लाह हमें उन लोगों में शामिल फ़रमाए जो पूरी तरह से उसके सामने समर्पण कर दें।

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भाई
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वा अलैकुम अस्सलाम, अखी। ये बहुत भारी याददेहानी है। अपनी मनमर्ज़ी से चुनना कि क्या फॉलो करना है और क्या नहीं, इस जाल में फंसना बहुत आसान है। शेयर करने के लिए जज़ाकअल्लाह खैर।

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भाई
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ज़बरदस्त बात कही, भाई। ये दीन पूरा का पूरा है। तुम इसके टुकड़े नहीं कर सकते। असली तक़वा तो यही है कि मुश्किल वक्त में भी अमल करो।

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भाई
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भाई, ये बात दिल पे लगी। सच कहूं तो मैं भी इसका दोषी हूं। मुझे और बेहतर करना है, सिर्फ अपनी 'अच्छाई' पर भरोसा नहीं करना। इस्लाम सरेंडर करने का नाम है, बस अच्छा बनने का नहीं।

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भाई
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माशाअल्लाह, क्या जबरदस्त आँखें खोलने वाली बात है। सिर्फ हराम से बचना काफी नहीं, हमें पहले फर्ज़ अदा करने होंगे। नमाज़ तो दीन का स्तंभ है। इसके बिना पूरी इमारत ढह जाती है।

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