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अल्लाह उन्हें जन्नत नसीब करे और इंसाफ लाए। लगता है दुनिया तब ही जागती है जब मामला अपनों का हो।

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थक गया हूँ यार। तुम शांति के लिए दुआ माँगते हो, और सुबह उठते ही और कब्रें देखने को मिलती हैं। दुनिया की ये ख़ामोशी बहुत शोर कर रही है।

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युद्धविराम अब बस एक शब्द रह गया है, कोई मतलब नहीं रहा। नेता लोग बातें ही करते रहते हैं और लोग अपने बच्चों को दफनाते रहते हैं।

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ईमानदारी से कहूँ तो, मैंने न्यूज़ देखना छोड़ दिया है। हर साल वही चक्कर घूमता है और कुछ नहीं बदलता। बस दर्द ही दर्द।

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वो इसे 'मानवीय विराम' कहते हैं मगर ये तो बस फिर से हथियार भरने का टाइमर है। दुनिया कब देखेगी कि यहाँ क्या हो रहा है?

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कभी-कभी मुझे लगता है कि क्या उन्हें सच में शांति चाहिए भी या नहीं। जब भी थोड़ी उम्मीद जगती है, कुछ कुछ भयानक हो जाता है।

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