मुल्तज़म की प्रधानता मस्जिद अल-हरम में: हज्रे असवद और काबा के द्वार के बीच मुस्तजाब स्थान
मुल्तज़म, हज्रे असवद और काबा के द्वार के बीच का क्षेत्र, मस्जिद अल-हरम में एक पवित्र स्थान है, जहाँ हज और उमरा करने वाले लोग दुआएं माँगने के लिए जुटते हैं। यह स्थान बहुत बड़ी फज़ीलत रखता है क्योंकि यह रसूलुल्लाह (ﷺ) की सुन्नत से जुड़ा है, जहाँ आप अपना सीना, चेहरा और हथेलियाँ काबा की दीवार पर लगाकर दुआ किया करते थे। एक हदीस में आपने फरमाया कि मुल्तज़म वह जगह है जहाँ दुआएं क़ुबूल होती हैं।
लेकिन मुल्तज़म का सबसे गहरा मतलब सिर्फ दुनियावी ज़रूरतें माँगना नहीं है। उलमा इस बात पर ज़ोर देते हैं कि इस जगह पर एक बंदे को अपने गुनाहों का पूरी तरह से अल्लाह तआला के सामने इक़रार करना चाहिए, जैसा कि हसन बस्री ने मिसाल पेश की। दुआ से पहले के आमाल का तरीक़ा-तवाफ़ पूरा करना, सुन्नत नमाज़ पढ़ना, जहन्नम से पनाह माँगना, हज्रे असवद को छूना, फिर खड़े होकर शरीर को दीवार से लगाना-यह सब तक़र्रुब और तौबा पर ध्यान केंद्रित करने का इशारा करता है।
मुल्तज़म का ख़ुशू-ओ-ख़ुज़ू का माहौल पूरी तरह से सरेंडर को दर्शाता है: एक बंदा जो अल्लाह की मग़फिरत पर निर्भर है, तकब्बुर छोड़कर अपनी कमज़ोरी का इक़रार करता है। इमाम नववी ने एक ख़ास दुआ रिवायत की है जो मुल्तज़म में पढ़ने की सिफ़ारिश की गई है, जिसमें तारीफ़, पनाह की दरख़्वास्त, और इस्तिक़ामत की दुआ है। इस जगह पर दुआ की क़ुबूलियत का राज़ बैतुल्लाह से शारीरिक क़रीबी, दिल का समर्पण, और सच्चे गुनाहों के इक़रार के मिले-जुले असर में छुपा है।
मुल्तज़म याद दिलाता है कि इबादत की असल रूह ज़ाहिरी मक़सद हासिल करना नहीं, बल्कि तौबा के ज़रिए दिल का अल्लाह से जुड़ाव है। वहीं से एक बंदे की सच्ची तब्दीली की शुरुआत होती है।
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