सलात-ए-इस्तिस्का बारिश माँगने के लिए: दलील, तरीका, नियत और दुआ
सलात-ए-इस्तिस्का एक सुन्नत-ए-मुअक्कदा नमाज़ है जो सूखे के वक़्त बारिश की दुआ माँगने के लिए पढ़ी जाती है। इसकी दलील नबी मुहम्मद स.अ.व. की हदीसों से है, जिनमें से एक हज़रत आइशा र.अ. की रिवायत है कि रसूलुल्लाह ने खुले मैदान में दुआ कराई यहाँ तक कि बारिश आ गई।
इसका तरीका ईद की नमाज़ या दो रकात सुन्नत नमाज़ की तरह है, बगै़र अतिरिक्त तकबीरों के। आम तौर पर इमाम और मुक्तदी बिना अज़ान और इक़ामत के मैदान में जमा होते हैं, दो रकात नमाज़ अदा करते हैं, फिर इमाम इस्तिस्का का ख़ुतबा देता है जिसमें तौबा और बारिश की दुआ की दावत दी जाती है।
सलात-ए-इस्तिस्का के बाद की दुआओं में मददगार, उपजाऊ और फ़ायदेमंद बारिश माँगी जाती है। मिसाल के तौर पर: "अल्लाहुम्मस-क़िना ग़ैसन मुग़ीसन, मरीअन, हनीअन..." (या अल्लाह, हम पर मददगार बारिश बरसा...)
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