अंधेरे में एक मोमिन की गुहार
सब को सलाम, सच कहूं तो, अभी ऐसा लग रहा है जैसे मेरी रूह ही टूट रही है। ये बोझ इतना भारी है – बार-बार ख्याल आता है कि मुझे शुरू से ही गलत बनाया गया था, जैसे मैंने ज़िंदगी में एक भी सच्चा अच्छा काम नहीं किया। गुनाहों का ढेर लग गया है और मुझे बस...सुन्न-सा, अल्लाह से दूर लगता है। मेरा दिल मुहरबंद-सा लगता है, जैसे वो दरवाज़ा जो खुलता ही नहीं। मैं जानता हूं कि मैंने लोगों को दुख पहुँचाया है, इतना कुछ गलत किया है, और कभी-कभी लगता है मैं सबसे नीच हूँ। ये डरावना है ये एहसास कि तुम राह से कितना दूर भटक सकते हो। ये अंधेरे ख्याल आते हैं – आसान रास्ता – लेकिन मैं जानता हूं कि ये तो बस इम्तिहान को छोड़ देना है। मुझे जो किया है उसका सामना करना होगा। ऐसा लगता है मैं बस इंतज़ार कर रहा हूँ, लेकिन किस चीज़ का? मुझे तो अब अल्लाह की रहम के लायक भी नहीं लगता। क्या किसी ने कभी इतना खोया हुआ महसूस किया है और सचमुच वापस अपनी राह पा ली हो?