गैर-मुस्लिम होते हुए भी प्रार्थना: क्या मेरी दुआएँ सुनी जाएँगी?
सबको सलाम। सीधे कहूँ तो, मैं एक गैर-मुस्लिम औरत हूँ, ईसाई परिवार में पली-बढ़ी लेकिन 12 साल की उम्र तक आते-आते मेरा विश्वास ही उठ गया। अब 25 की हूँ और बहुत मुश्किल दौर से गुज़र रही हूँ। चिंता और तनाव की वजह से मैं बहुत ज़्यादा खाने लगी हूँ, और धार्मिक न होते हुए भी आखिरी दिनों में मुझे बार-बार लगता है कि मैं अल्लाह से दुआ माँगना चाहती हूँ। इस्लाम की बातें मुझे ज़्यादा समझ आती हैं, ईसाई धर्म से कहीं ज़्यादा। मैंने कुरआन भी पढ़ा है और रमज़ान के कुछ रोज़े मुस्लिम दोस्तों के साथ रखे भी हैं। लेकिन फिर भी मेरे मन में यह शक बना हुआ है कि आखिर अल्लाह है भी या नहीं। इन शकों के बावजूद मुझे बस यही ख़्याल आता रहता है कि दुआ करूँ। मेरी दिक़्कत यह है कि अल्लाह (सुबहाना व तआला) से दुआ करना तो एक तरह से बँधा हुआ लगता है-ख़ास मुद्राएँ, ख़ास शब्द-यह सब मेरी समझ से अलग है। आप लोग मुझे क्या सलाह देंगे कि मैं कैसे दुआ करूँ? और क्या मेरी दुआएँ सुनी भी जाएँगी अगर मैं पक्की आस्तिक नहीं हूँ? मेरी बिखरी हुई बातों को सुनने के लिए शुक्रिया।