क़ुरआन के बारे में एक याद
अस्सलामु अलैकुम, प्यारे भाइयों और बहनों। अगर आपको कोई संकेत चाहिए-बस इस बारे में एक पल के लिए सोचिए। क़ुरआन शब्द मूल 'क़ा-रा-आ' से आता है, जिसका मूल अर्थ है पढ़ना और एक साथ लाना। तो यह तिलावत के बारे में है, क्योंकि यह अब तक का सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला ग्रंथ है, और इकट्ठा करने के बारे में भी है, क्योंकि यह अहकाम, कहानियाँ और मार्गदर्शन सब एक जगह जमा करता है। क़ुरआन को अपना करीबी साथी बनाइए, न कि सिर्फ़ शेल्फ पर धूल जमा रखने की कोई चीज़। यह आपके रब का कलाम है, हर मुसीबत के लिए एक हिदायत और हल। यह दिल को सुकून देता है। क़ुरआन को अपना सच्चा दोस्त बनने दीजिए। इसकी इज़्ज़त कीजिए। जब आप तिलावत करते हैं, तो फ़रिश्ते आपके साथ होते हैं। जितना अधिक आप तिलावत करेंगे, जन्नत में आपका दर्जा उतना ही ऊँचा होगा। तो अपने क़ुरआन को मज़बूती से थामिए। इसकी आयतों पर गहराई से सोचिए। तदब्बुर की आदत डालिए। क़ुरआन को अपने दिल में ज़िंदा रखने का लक्ष्य रखिए। सिर्फ़ शब्दों को झटके से न पढ़ जाइए-उन्हें देखिए, उनके वज़न को महसूस कीजिए, और हर आयत पर अमल कीजिए। आप जो भी हरफ़ पढ़ते हैं, वह आपके लिए सवाब लाता है। क़ुरआन में हर चीज़ का जवाब है। यह अंतिम हिदायत है। असल में अमीर व्यक्ति वह है जो तन और मन से क़ुरआन की तरफ़ मुड़ता है। इसकी वह सारी इज़्ज़त लायक़ है जिसकी आप कल्पना कर सकते हैं। अगर आप क़ुरआन की इज़्ज़त करेंगे, तो यह भी आपकी इज़्ज़त करेगा। यह क़यामत के दिन आपकी शफ़ाअत करेगा। हर सूरह की शुरुआत 'बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम' से होती है। हमारा रब हमारे पास रहमत और मुहब्बत लेकर आता है, तो दूसरों के साथ भी रहम का सुलूक रखिए जैसा आपका रब आपके साथ रखता है। क़ुरआन कोई ऐसी किताब नहीं है जिसे आप एक बार उठा लें और भूल जाएँ। यह आपके आख़िरी साँस तक आपके साथ रहता है। यह वह किताब है जिसकी तरफ़ आप हमेशा मुड़ेंगे जब ज़िंदगी मुश्किल हो या आराम चाहिए हो। इसकी जगह कुछ भी नहीं ले सकता। हमारी ज़िंदगी में इसका इतना बड़ा महत्व है। तो क़ुरआन की इज़्ज़त कीजिए ताकि यह बदले में आपकी इज़्ज़त कर सके। जो व्यक्ति कुशलता से क़ुरआन की तिलावत करता है और बेहतर होने की कोशिश करता रहता है, वह नेक फ़रिश्तों के साथ होगा। और जिसे इसे पढ़ने में कठिनाई होती है और वह संघर्ष करते हुए पढ़ता है, उसे दोगुना सवाब मिलता है। यह दिखाता है कि आपको बिल्कुल निर्दोष या हर नियम पूरी तरह जानने वाला होना ज़रूरी नहीं है। हमें हमेशा तजवीद में बेहतर बनने का काम करना चाहिए। हमेशा अपने मख़ारिज को सुधारने और बेहतर बनाने की कोशिश करें। लेकिन इस वजह से क़ुरआन पढ़ना ही छोड़ न दें। मैं ख़ुद भी क़ुरआन के साथ संघर्ष करती हूँ। मुझे इसे बिल्कुल सही पढ़ना कठिन लगता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि मेरे और मेरे रब के बीच एक दीवार है क्योंकि यह इतना मुश्किल है, और कभी मैं ख़ुद को उन लोगों से तुलना करते पाती हूँ जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी इसका अध्ययन किया है। यह वाकई मुझे नीचे गिरा देता है, ख़ासकर दूसरों के सामने तिलावत करते समय। लेकिन अल्हम्दुलिल्लाह, अल्लाह ने आपको चुना है। उसने आपको सीखते रहने का यह मौक़ा दिया है। तो हमेशा यह दुआ पढ़ा कीजिए: *اللَّهُمَّ انْفَعْنَا بِمَا عَلَّمْتَنَا، وَعَلِّمْنَا مَا يَنْفَعُنَا، وَزِدْنَا عِلْمًا نَافِعًا* अल्लाहुम्म इन्फ़अना बिमा 'अल्लमतना, व 'अल्लिमना मा यन्फ़अ'उना, व ज़िदना 'इल्मन नाफ़िआ।